योगदर्शन में परिणाम
यहाँ हम योगदर्शन-वर्णित चित्त के परिणामों के किञ्चित कठिन विषय पर चर्चा करेंगे । इस विषय में मेरा कुछ नया चिन्तन है । उसको मैं प्रस्तुत कर रही हूं ।
योग के आठ अंगों के अन्तर्गत धारणा, ध्यान व समाधि के अन्तिम तीन अंगों को समझाने के बाद, पतञ्जलि मुनि चित्त के तीन परिणामों को बताते हैं । ये इस प्रकार हैं –
- व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावो निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥ ३।९ ॥
अर्थात (व्युत्थान=) कार्यरत चित्त के संस्कारों के दबने और निरोध चित्त के संस्कारों के उत्पन्न होने से, चित्त निरोध के क्षण से युक्त हो जाता है, जो कि उसका निरोधपरिणाम (=निरोध-परिवर्तन) कहलाता है ।
व्यास अपने भाष्य में लिखते हैं कि व्युत्थान संस्कार चित्त के धर्म होते हैं, परन्तु प्रत्ययात्मक या ज्ञानात्मक नहीं होते । इसलिए वे प्रत्ययों के निरोध करने पर = चित्त को शान्त करने पर भी बने रहते हैं । निरोध संस्कार भी चित्त के धर्म होते हैं । जब व्युत्थान संस्कार दबते हैं और निरोध संस्कार उजागर होते हैं, तब चित्त निरोधक्षण से अन्वित हो जाता है । उस चित्त के प्रतिक्षण संस्कार का बदलना ’निरोधपरिणाम’ कहलाता है । वह संस्कारशेष-चित्त निरोधसमाधि = असम्प्रज्ञातसमाधि वाला होता है ।
इस वर्णन में कुछ अपूर्णताएं हैं । संस्कार चित्त के धर्म होते हैं, इसमें तो कोई कठिनाई नहीं है । अब व्युत्थान संस्कार यदि प्रत्ययात्मक नहीं होते, तो वे कैसे होते हैं ? चित्त तो प्रत्ययात्मक ही होता है । प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि में क्रमशः प्रत्ययों का ही निरोध करते आए हैं । अब यह नया धर्म कहां से आ गया ? दूसरे, वे ये भी नहीं बताते कि, यदि निरोध से व्युत्थान संस्कार शान्त नहीं होते, तो फिर वे कैसे दबते हैं ? तीसरे, प्रतिक्षण क्या चित्त में व्युत्थान संस्कार उठते हैं, फिर दबते हैं, फिर निरोध संस्कार उठते हैं, जो उस चित्त का निरोधपरिणाम है ? परन्तु एक क्षण में तो एक ही संस्कार हो सकता है – या तो व्युत्थान संस्कार या फिर निरोध संस्कार । तो फिर चित्त में एक क्षण व्युत्थान संस्कार होगा और दूसरे क्षण निरोध । तो फिर सूत्र में बताया गया ’निरोधक्षणचित्तान्वयः’ गलत हो जायेगा ! इसलिए इन कारणों से यह व्याख्या सही नहीं है ।
मेरे अनुसार, पतञ्जलि कह रहे हैं कि जो भी चित्त की चेष्टा है, वह व्युत्थान है । उसका चित्त में निरूपण व्युत्थान संस्कार द्वारा होता है – चित्त में neural activity होती है । जब सभी विचार बन्द हो जाते हैं, तब चित्त सम्पूर्णतया शान्त हो जाता है, निरुद्ध हो जाता है, neural activity थम जाती है । यह है व्युत्थान संस्कारों का दबना और निरोध संस्कारों का उजागर होना । जिस क्षण वह निरोध संस्कार उत्पन्न होता है, उस क्षण में चित्त निरुद्ध हो जाता है । यह परिवर्तन ’निरोधपरिणाम’ कहलाता है ।
यही समाधि १।५१ में कही गई निर्बीज समाधि है – तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः – निर्विचार समाधि की ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कारों का भी निरोध होने पर सब संस्कारों का निरोध हो जाता है; यह निर्बीज समाधि कहलाती है । इसका प्रमाण अगले ही सूत्र में मिल जाता है –
तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥३।१०॥
अर्थात् उस चित्त की वृत्ति संस्कारों से शान्तता को लिए होती है – उसमें सभी संस्कार शान्त हो जाते हैं ।
व्यास यहां कहते हैं, “निरोधसंस्कार के अभ्यास से कुशल हो जाने पर चित्त की प्रशान्तवाहिता (स्थिति) हो जाती है । यदि वह निरोधसंस्कार मन्द हो जाए, तो व्युत्थान संस्कार पुनः निरोध संस्कारों पर हावी हो जाते हैं ।” इस तरह वे सूत्र पर विशेष प्रकाश नहीं डालते हैं । तथापि वे ये मानते हैं कि ’प्रशान्तवाहिता संस्कारात्’ का अर्थ निरोधसंस्कार होना है । वस्तुतः, निरोधसंस्कार संस्कार-शून्य होता है, क्योंकि उसमें चित्त निरुद्ध होता है । यही इस सूत्र का सीधा-सीधा अर्थ है । परन्तु केवल क्षणिक परिणाम के कहे जाने से संकेत मिलता है कि यह सभी समाधियों को कह रहा है, जिनकी पराकाष्ठा निर्बीज समाधि है । इस समाधिस्थ चित्त का लक्षण कहा गया था – क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥१।४१॥ – चित्त की वृत्तियां क्षीण होकर, निर्मल स्फटिक मणि के समान, ग्रहीता आत्मा, ग्रहण ज्ञान और ग्राह्य विषय में, उस-उस के स्वरूप वाला जैसा हो जा जाना समापत्ति, या समाधि-अवस्था है । और दूसरे – तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः – केवल विषय का ज्ञान होना, स्वस्वरूप का जैसे लोप हो जाना समाधि कहलाती है । इस पिछले वाक्य में एक अन्य वाक्य ध्वनित होता है – स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥१।४३॥ – जिसमें प्रथम स्तर की समाधि, वितर्का, का द्वितीय प्रभेद का वर्णन करते हुए बताया गया था कि स्मृति के परिशुद्ध हो जाने पर, अर्थमात्र का बोध होना और अपना स्वरूप न अनुभव होना निर्वितर्का समाधि है । “वृत्तियां क्षीण होती हैं (१।४१)” का अर्थ है कि चित्त निरोधावस्था में पहुंचने लगा – उसमें निरोधपरिणाम होने लगा, अर्थात् समाधि-अवस्था में निरोधपरिणाम होने लगता है । इस प्रकार ३।९-१० में समाधि-अवस्था को ही कहा गया है ।
अब देखते हैं अगला परिणाम ।
- सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ३।११ ॥
अर्थात सर्वार्थता का क्षय और एकाग्रता का उदय चित्त का समाधिपरिणाम कहलाता है ।
व्यास कहते हैं, “सर्वार्थता चित्त का धर्म है, और एकाग्रता भी । सर्वार्थता का क्षय अर्थात् तिरोभाव होना, एकाग्रता का उदय अर्थात् आविर्भाव होना – इन दोनों धर्मों से युक्त चित्त समाधि को प्राप्त होता है । यह उसका समाधिपरिणाम है ।” पुनः यहां वे कुछ भी स्पष्ट नहीं करते हैं ।
सर्वार्थता का अर्थ है – सब विषयों में भ्रमण करने का भाव । एकाग्रता का अर्थ है एक विषय पर ध्यान लगाने का भाव । जब ये दो शक्तियां क्रमशः अस्त और उदित होती है, तब चित्त एकाग्र कहलाता है, और वह उसका समाधिपरिणाम होता है । क्योंकि एकाग्रता निरोध से पूर्व की स्थिति है, इसलिए यह समाधिपरिणाम वस्तुतः ध्यानावस्था में प्राप्त होता है, समाधि में नहीं । ध्यान की परिभाषा भी यही है – तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥३।२॥ – एक देश में बन्धे चित्त को एक ही ज्ञान बने रहना ध्यान है । दूसरे शब्दों में एकाग्र होना ही ध्यान है ।
अब तृतीय परिणाम् –
- ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥ ३।१२ ॥
अर्थात् वैसे ही, पुनः तुल्य ज्ञान का शान्त और उदित होना चित्त का एकाग्रता-परिणाम है ।
शान्त का यहां अर्थ है अतीत में जाना और उदय का अर्थ है वर्तमान में प्रकट होना । सो, जब एक क्षण से दूसरे क्षण में समान वस्तु के विषय में सोचते हैं, तब हमारे चित्त में एकाग्रता आती है ।
व्यास यहां कहते हैं, “समाधि को प्राप्त चित्त में पूर्व ज्ञान शान्त होने पर, बाद वाला उसके सदृश उदित होता है । समाधि-चित्त दोनों से सम्बद्ध होता है । और यही क्रम समाधि के टूटने तक चलता रहता है । यही धर्मी चित्त का एकाग्रता-परिणाम है ।” सो, व्यास एकाग्र-परिणाम को समाधि-प्राप्त चित्त का ही परिणाम मानते हैं । उस अर्थ का पोषक है, इस सूत्र में प्राप्त ’ततः’ जिसका अर्थ ’अनन्तर’ करना स्वाभाविक है । परन्तु क्या फिर यह पूर्व सूत्र के समानार्थ नहीं हो गया ? दोनों में क्या भेद रहा ? यदि पूर्व सूत्र अनेकाग्र चित्त को कह रहा था, तो वह समाधिस्थ कैसे हो सकता है ? अथवा क्या पतञ्जलि ने एकाग्र का अर्थ ही उलट दिया है ? व्यास ने स्वयं कहा था (सूत्र १।१ के भाष्य में) कि चित्तों की एकाग्रता का बढ़ता क्रम इस प्रकार है – मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध । समाधि एकाग्रता से निरोध की ओर ले जाती है; तो यहां समाधि से एकाग्रता की ओर जाना कैसे मान्य हो सकता है ?
वस्तुतः, सभी भाष्यकार समाधि-परिणाम को निरोध-परिणाम के पूर्व का मानते हैं । उसी क्रम से यहां भी एकाग्र-परिणाम समाधि-परिणाम के पूर्व का है, ऐसा मानना उचित है । दूसरे शब्दों में, यह धारणावस्था का परिणाम है, जहां पतञ्जलि कहते हैं – देशबन्धचित्तस्य धारणा ॥३।१॥ – अर्थात् किसी देश-विशेष में चित्त को एकाग्र करना धारण कहाता है । धारणा में चित्त थोड़ा-सा सीमित परिधि के देश में घूमेगा, एक बिन्दु पर केन्द्रित नहीं होगा । देश कहने का यही प्रयोजन है । उसका एक बिन्दु पर ठहरना जब हो जाता है, तब ध्यानावस्था प्राप्त हो जाती है । इसीलिए ३।१२ सूत्र में ’तुल्यप्रत्यय’ कहा गया है, न कि ’एकप्रत्यय’ । और इसीलिए ’ततः’ का अर्थ यहां ’उसी प्रकार’ समझना चाहिए, न कि ’उसके बाद’ ।
इन तीनों में एक और विशेषता है, जो कि अगले सूत्र में निरूपित है –
एतेन भुतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥३।१३॥
अर्थात् उपर्युक्त से भूतों और इन्द्रियों के धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम भी कह दिए गए – उन्हें समानता से समझ लेना चाहिए ।
यहां व्यास ने धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों को समझाया है । वे कहते हैं कि, जैसे ३।९ सूत्र में व्युत्थान संस्कार-रूपी चित्त धर्म दबते हैं और निरोध संस्कार उदय होते हैं, यह धर्म में परिवर्तन होने से, निरोध-परिणाम होने के साथ-साथ, धर्म-परिणाम भी है । और निरोध संस्कार के उबरने से पहले, जो व्युत्थान संस्कारों का अभिभव होना दृढ़ होता है, और फिर निरोध संस्कारों का बलवान् होना होता है, वह अवस्था-परिणाम है, अर्थात् धर्म-परिणाम के मध्य में अवस्था-परिणाम होता है । वह धर्म-परिणाम से छोटे काल में होता है । लक्षण-परिणाम को वे अतीत, वर्तमान और अनागत (भविष्य) से सम्बद्ध बताते हैं । उपर्युक्त उदाहरण में, निरोध संस्कार धर्म पहले अनागत में छुपा होता है । इसे वे अनागत लक्षण परिणाम कहते हैं । फिर वह वर्तमान् में उजागर होता है । यह उसका वर्तमान् लक्षण परिणाम हुआ । व्युत्थान संस्कार धर्म अतीत में चला गया । वह उसका अतीत-लक्षण-परिणाम होता है । विचार करने पर ज्ञात होता है कि इस प्रकार तो लक्षण-परिणाम धर्म-परिणाम के समान हो गया । काल के कारण क्षय और उदय हो रहा है, वह तो धर्म-परिणाम में निहित है ही । और स्वयं काल के परिवर्तन की चर्चा तो व्यास कर नहीं रहे । इसलिए काल में धर्म का परिवर्तन एक ही वस्तु है – धर्म-परिणाम ।
तो फिर लक्षण परिणाम क्या है ? व्यास की धर्म-परिणाम की व्याख्या में ही इसका उत्तर छिपा है ! वस्तुतः, पतञ्जलि का ३।१३ सूत्र कह रहा है कि ऊपर हमने चित्त के धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम क्रमशः कह दिए; इसी से भूत और इन्द्रियों में ये परिणाम समान रूप में समझ लो । अर्थात् निरोध परिणाम धर्म-परिणाम है, समाधि परिणाम लक्षण परिणाम है और एकाग्रता-परिणाम अवस्था-परिणाम है ।
संस्कार चित्त के धर्म हैं, यह निश्शंक है । इसलिए उनमें परिवर्तन होना धर्म-परिणाम है । ग्याहरवें सूत्र में जो एकाग्रता और सर्वार्थता हैं, वे चित्त की शक्तियां हैं, धर्म नहीं । जब हम ’एकाग्र चित्त’ कहते हैं तब वह चित्त का धर्म होता है, क्योंकि वह चित्त में एक वस्तु के संस्कार को कहता है । परन्तु ’एकाग्रता’ एकाग्र हो सकने का भाव है । समाधि-परिणाम में सर्वार्थता की शक्ति, जो हम सभी में स्वतः पाई जाती है, उसका क्षय होता है, और एकाग्रता की शक्ति उत्पन्न होती है । तृतीय, एकाग्रता-परिणाम में क्षणिक परिवर्तनों की चर्चा है, जो कि छोटे परिवर्तनों को कहते हैं, धर्म-परिवर्तन को नहीं । यह व्यास-भाष्य अनुसार ही है । इन परिणामों को मिट्टी से घट के परिवर्तन से समझा जा सकता है – मिट्टी जब घट में परिवर्तित होती है, तब वह चूरा-चूरा न रहकर, एक दृढ़ आकार में स्थिर हो जाती है । यह धर्म-परिणाम है । उसमें पानी सोकने की शक्ति नष्ट हो जाती है, इसलिए उसमें पानी जमा करने की शक्ति आ जाती है । यह लक्षण-परिणाम है । तीसरे, उसकी जो बीच की स्थितियां हैं – पिण्डाकार, कच्चा घड़ा, तपाया गया घड़ा आदि – वे सब अवस्था-परिणाम हैं ।
इस प्रकार समझने से ज्ञात होता है कि ३।१३ सूत्रानुसार चित्त के पतञ्जलि व्याख्यात परिवर्तनों के साथ-साथ शरीर के अन्य भूतों (कोषिकाओं आदि) और इन्द्रियों में भी समान परिवर्तन होता है । व्यास ने तो ये परिवर्तन नहीं बताए हैं । इन्द्रिय के परिवर्तन मुझे कुछ समझ आए हैं । वे इस प्रकार – १) चित्त के साथ-साथ, इन्द्रियां भी निरुद्ध हो जाती है – वे कार्यरत नहीं रहती हैं । यह है उनका धर्म-परिणाम । २) इन्द्रिय में भी एकाग्रता की शक्ति आ जाती है – वे एक विषय में निरन्तर ध्यान लगा सकने वाली हो जाती हैं । यह है उनका लक्षण-परिणाम । ३) निरुद्ध होने से पहले-पहले, इन्द्रियां अपनी चंचलता त्यागने लगती हैं । यह है उनका अवस्था-परिणाम । शेष शरीर में कैसे ये परिवर्तन होंगे, यह मुझे समझ नहीं आया । सम्भवतः कुछ पहुंचे हुए योगी-जन इसपर प्रकाश डाल सकते हैं ।
दर्शनादि पुरातन ज्ञान-ग्रन्थों में ’एतेन व्याख्यातम्’ से प्रायः दो विषयों की समानता बताकर, दूसरे विषय को पुनः नहीं दौहराया जाता । इसी प्रकार, यदि दो समूहों की संख्या बराबर हो, तो वे क्रमशः विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध वाले होते हैं, जैसे कि अष्टाध्यायी में । यहां निरोध-, समाधि- और एकाग्रता-परिणाम व धर्म-, लक्षण- और अवस्था-परिणाम में यही सम्बन्ध है । इन दो कारणों से ३।१३ सूत्र को उपर्युक्त प्रकार से समझना ही सम्यक् प्रतीत होता है ।
