न्यायदर्शन का वात्स्यायन-भाष्य

ऋषि गौतम प्रणीत न्यायदर्शन भारत के प्राचीन छः दर्शनों में से एक है, जिसकी विषय-वस्तु सत्य का निर्धारण है । उसका प्राचीनतम प्रामाणिक भाष्य वात्स्यायन का उपलब्ध है । उसी के आधार पर नव्य-न्याय विकसित हुआ, और इतना लोकप्रिय हुआ कि अब तो गौतम के सूत्रों को देखने वाले कम ही लोग हैं । इसी वर्ष के मार्च माह में मुझे राजस्थान विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र विभाग के उच्च अध्ययन केन्द्र से निमन्त्रण मिला कि मैं वहां जाकर अपना एक शोधपत्र प्रस्तुत करूं । यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय तो था ही, परन्तु इस संगोष्ठी में भाग लेकर, मुझे नैयायिकों के सामने अपने कुछ विशेष विचार प्रस्तुत करने का भी अवसर मिला, जो विचार मुख्य विचारधारा से कुछ भिन्न हैं । मैंने वात्स्यायन के भाष्य पर एक संशय प्रस्तुत किया जिसका सम्बन्ध सम्पूर्ण न्यायदर्शन से है, क्योंकि वह बहुत ही मौलिक है । मुझे कोई विशेष प्रतिक्रिया तो नहीं प्राप्त हुई… उसी पत्र का एक अंश इस लेख में दे रही हूं । आशा है पाठकगण अवश्य अपने विचारों से मुझे अवगत कराएंगे ।

न्याय कहता है कि किसी विषय पर अपने मत को सिद्ध करने के लिए प्रतिद्वन्द्वियों को वाद करना चाहिए । यही अनन्तरकाल में शास्त्रार्थ कहाने लगा । अपने मत को प्रस्तुत करने के लिए पञ्चावयवों का आलम्बन करना चाहिए । वे पञ्चावयव इस प्रकार हैं –

  • जो सिद्ध करना है, अर्थात् साध्य, उसका निर्देश, अर्थात् उसका एक वाक्य में प्रकट करना, प्रतिज्ञा [1] पहला अवयव है । इसको अंग्रेज़ी में hypothesis कहते हैं ।
  • दूसरा अवयव हेतु[2] है, जो कि साध्य को साधता है एक उदाहरण के साधर्म्य या वैधर्म्य द्वारा । 
  • यह उदाहरण[3] अगला अवयव है । उस उदाहरण में एक ऐसा दृष्टान्त होता है, जो कि साध्य का सधर्मी या विधर्मी होता है । दृष्टान्त[4] वह कहा गया है कि जिस विषय में लौकिक (=सामान्य) परीक्षकों का मतभेद न हो, अर्थात् विषय इतना स्पष्ट हो कि न्याय से अनभिज्ञ जन भी उस विषय में कोई सन्देह न रखते हों ।  साध्य से उसके साधर्म्य या वैधर्म्य के आधार पर, वह दृष्टान्त ’उदाहरण’ कहलाता है और हेतु में इस साधर्म्य या वैधर्म्य को प्रकट किया जाता है ।
  • हेतु से किस प्रकार साध्य सिद्ध होता है, उदाहरण के समान या विपरीत होने के कारण, यह ’तथा’ या ’न तथा’ कहकर उपसंहार किया जाता है । इसे उपनय[5] कहते हैं ।
  • अन्तिम अवयव है निगमन[6], जिसमें हेतु के साथ-साथ प्रतिज्ञा को पुनः दौहराया जाता है, यह बताने के लिए “इस हेतु से यह मेरा मत है” । अंग्रेजी में यह Q.E.D. statement कहलाता है ।

एक उदाहरण से ये सभी स्पष्ट हो जायेंगे । सो, मैं वात्स्यायन का ही उदाहरण उद्धृत करती हूं –

अनित्यः शब्द इति प्रतिज्ञा । उत्पत्तिधर्मकत्वादिति हेतुः । उत्पत्तिधर्मकं स्थाल्यादिद्रव्यमनित्यमित्युदाहरणम् । तथा च उत्पत्तिधर्मकः शब्द इत्युपनयः । तस्मादुत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यः शब्द इति निगमनम् । वैधर्म्योक्तेऽपि अनित्यः शब्दः । उत्पत्तिधर्मकत्वात् । अनुत्पत्तिधर्मकमात्मादिद्रव्यं नित्यं दृष्टम् । न च तथानुत्पत्तिधर्मकः शब्दः । किं तर्हि ? उत्पत्तिधर्मकः शब्दः । तस्मादुत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यः शब्द इति ॥ १।१।३९ वा०भा० ॥

अर्थात्, साधर्म्य पक्ष में –

प्रतिज्ञा : शब्द अनित्य है ।

हेतु : क्योंकि वह उत्पत्तिधर्मक है ।

उदाहरण : उत्पत्तिधर्मक थाली आदि द्रव्य अनित्य हैं ।

उपनय : वैसे ही शब्द भी उत्पत्तिधर्मक है ।

निगमन : इसलिए उत्पत्तिधर्मक होने के कारण, शब्द अनित्य है ।

या, वैधर्म्य पक्ष में –

प्रतिज्ञा : शब्द अनित्य है ।

हेतु : क्योंकि वह उत्पत्तिधर्मक है ।

उदाहरण : अनुत्पत्तिधर्मक आत्मा आदि द्रव्य नित्य देखे जाते हैं ।

उपनय : शब्द वैसा अनुत्पत्तिधर्मक नहीं है ।

निगमन : इसलिए उत्पत्तिधर्मक होने के कारण, शब्द अनित्य है ।

इन पञ्चावयवों को आगे समझाते हुए, वात्स्यायन कहते हैं – 

सम्भवस्तावत् शब्दविषया प्रतिज्ञा । आप्तोपदेशस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यां प्रतिसन्धानात् । अनृषेश्च स्वातन्त्र्यानुपपत्तेः । अनुमानं हेतुः । उदाहरणे सादृश्यप्रतिपत्तेः । तच्चोदाहरणभाष्ये व्याख्यातम् । प्रत्यक्षविषयमुदाहरणं दृष्टेनादृष्टसिद्धेः । उपमानमुपनयस्तथेत्युपसंहारात् न तथेति चोपमानधर्मप्रतिषेधे विपरीतधर्मोपसंहारसिद्धेः । सर्वेषामेकार्थप्रतिपत्तौ सामर्थ्यप्रदर्शनं निगमनमिति ॥ १।१।३९ वा०भा० ॥

अर्थात् (मुख्यांश) –

प्रतिज्ञा शब्द प्रमाण होता है, क्योंकि आप्त लोगों का उपदेश प्रत्यक्ष और अनुमान पर आधारित होता है (और प्रतिज्ञा उनका उपदेश है), और जो ऋषि नहीं होते हैं, उनके वाक्यों में जो स्वातन्त्र्य (=प्रमाणों का अभाव) होता है, वह प्रतिज्ञा में नहीं पाया जाता ।

हेतु अनुमान प्रमाण होता है, क्योंकि उसमें उदाहरण से सादृश्य दिखाया जाता है ।

उदाहरण प्रत्यक्ष प्रमाण होता है, क्योंकि उसमें दृष्ट से अदृष्ट की सिद्धि होती है ।

उपनय उपमान प्रमाण होता है, क्योंकि उसमें ’तथा’ या ’न तथा’ से उपसंहार करके साधर्म्य या वैधर्म्य कहा जाता है । 

निगमन में सब अवयवों से साध्य की प्रतिपत्ति का सामर्थ्य प्रदर्शित किया जाता है ।

 इस प्रकार वात्स्यायन के अनुसार, पहले चार अवयव स्वयं एक-एक प्रमाण हैं । यह बहुत ही विचित्र विचार है, क्योंकि गौतम ने तो सभी प्रमाण हेतु माने हैं, जिनसे साध्य साधा जा सके ! अगर इन अवयवों को इस प्रकार समझा जाए, तो तर्क करना तो असम्भवप्राय ही हो जायेगा, क्योंकि तर्क – जो कि अज्ञात विषय पर ऊहा करना होता है – उसमें प्रायः केवल प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण ही होते हैं, जैसे कि स्वयं न्यायदर्शन के दूसरे, तीसरे और चौथे अध्याय में पाया जाता है । वात्स्यायन के मत में उपनय के भी प्रमाण होने से, उसके बिना कोई भी मत पूर्णतया प्रस्तुत करना असम्भव है !

यही नहीं, इस मत को मानने से, प्रश्नों की झड़ी उपस्थित हो जाती है । उनमें से कुछ ये हैं –

  • यदि प्रतिज्ञा शब्द प्रमाण है, तो उसपर चर्चा करने की, उसे प्रमाणित करने की आवश्यकता ही क्या है ?
  • और यदि प्रत्येक शब्द प्रमाण अन्य प्रमाणों से प्रमाणित किया जा सकता है, तो शब्द प्रमाण को प्रमाण की श्रेणी में रखा ही क्यों जाए ?
  • यदि अनुमान प्रमाण प्रतिज्ञा और उदाहरण के साधर्म्य को बताता है, तो उस कार्य-कारण सम्बन्ध का क्या हुआ जो कि गौतम ने पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट में सूत्रित किया था ? क्योंकि कार्य-कारण सम्बन्ध में साधर्म्य-वैधर्म्य की कोई आवश्यकता नहीं है । मेघ और वर्षा में साधर्म्य, या बीज और वृक्ष में कोई साधर्म्य-वैधर्म्य हो, ऐसा कोई नियम नहीं है ।
    मेरा मानना है कि, क्योंकि नव्य न्याय ही आजकल अधिक प्रचलित है, और नव्य न्याय वात्स्यायन के भाष्य पर आधारित है, इसलिए सब लोग गौतम के सूत्रों को देखते ही नहीं हैं । वात्स्यायन के अनुयायियों को ’व्याप्ति’ पदार्थ बनाना पड़ा, जो शब्द न तो गौतमीय सूत्रों, न वात्स्यायन के भाष्य में कहीं भी पाया जाता है । यह व्याप्ति कार्य-कारण सम्बन्ध को उस प्रकार न समझ कर, बड़ी क्लिष्टता से वही बात कहता है । जैसे अग्नि धूम में व्याप्त होने से, धूम से अग्नि का अनुमान किया जा सकता है । नहीं, अग्नि धूम में व्याप्त नहीं है, अग्नि धूम का कारण है !! इस कारण पूरा शास्त्र ही इतना क्लिष्ट हो गया कि आज कोई भी इसका प्रयोग करके कुछ भी प्रमाणित करने में असमर्थ है…
  • यदि उदाहरण में दृष्ट से अदृष्ट की प्रतिपत्ति होती है, तो क्या वह अनुमान प्रमाण नहीं होना चाहिए ? वह प्रत्यक्ष प्रमाण कैसे हुआ ? क्या प्रत्यक्ष प्रमाण से दृष्ट से अदृष्ट की प्रतिपत्ति की जाती है ? गौतम ने तो ऐसा कहीं भी नहीं कहा !
  • इन अवयवों में सिद्धान्त कहां है ? यदि हम सिद्ध पदार्थों को नहीं अवयवों में हेतु-रूप नहीं ले पाएंगे, तो उनसे अन्य पदार्थों को कैसे सिद्ध करेंगे, जिस प्रकार ज्यामिति में त्रिकोण के कोणों का योग १८०˚ सिद्ध करने के बाद, हम उससे अनेकों निष्कर्ष निकालते जाते हैं ?
  • यदि उपनय उपमान प्रमाण है तो क्या हमें सदा ही एक उपमा ढूढ़नी पड़ेगी जिसके सहारे से हम कुछ भी प्रमाणित कर सकें ? आदि आदि ।
    किसी भी न्याय के छात्र ने देखा होगा कि आजकल के न्याय के सभी उदाहरणों में केवल उपमा का ही सहारा लिया जाता है, जिस प्रकार ऊपर शब्द के अनित्यत्व के वाद में है । वास्तव में गौतम कहीं भी इस प्रकार की उपमा नहीं देते । इसी कारण नव्य-नैयायिक और वात्स्यायन के भाष्य के अनुयायी गौतम के न्यायशास्त्र में दिए किसी भी तर्क में कोई भी प्रमाण या सिद्धान्त देख ही नहीं पाते !


चलिए, हम देखते हैं । शब्द की अनित्यता का यही प्रकरण गौतम ने भी दिया है, जहां सूत्र है –

प्रागुच्चारणादनपुलब्धेरावरणाद्यनुपलब्धेश्च ॥२।२।१८॥

अर्थात् उच्चारण के पूर्व अनुपलब्ध होने के कारण, और (पूर्वावस्था में) आवरण उपलब्ध न होने के कारण (शब्द अनित्य है) ।

यह पूरा तर्क है । यहां अवयव इस प्रकार हैं । 

प्रतिज्ञा – शब्द अनित्य है (यह पूर्व सूत्रों से अध्याहृत है) ।

प्रथम हेतु – शब्द उच्चारण के पूर्व उपलब्ध नहीं है ।

दूसरा सम्बद्ध हेतु – तब कोई आवरण भी उपलब्ध नहीं है ।

तो क्या यहां उदाहरण भी नहीं है ? यदि वात्स्यायन के अनुसार हम परखें, तो यहां कोई और ऐसा धर्मी नहीं है जो कि अनित्य हो और उच्चारण के पूर्व उपलब्ध न हो, जिसे हम उदाहरण मान सके । इसी प्रकार अनित्यता और आवरणहीन भी कोई अन्य पदार्थ नहीं है । तो वात्स्यायन के अनुसार यह तर्क अपूर्ण है ।

अब गौतम के सूत्रों के अनुसार परखते हैं । शब्द उच्चारण से पूर्व उपलब्ध नहीं होता – क्या इसमें लौकिक परीक्षकों की सम्मति है ? हां, अवश्य है । यह सभी का साधारण अनुभव है । इसलिए यह दृष्टान्त की श्रेणी में आता है । फिर इसमें साध्य का धर्म कहां है जिससे यह उदाहरण कहलाया जाए ? सो, उच्चारण  ही शब्द के तद्धर्मभावी है । इसलिए वह ही उदाहरण है । शब्द तो अन्य प्रकार के भी होते हैं, जैसे घण्टे का शब्द, नदी का शब्द, आदि । उनमें से एक है उच्चारण, जिसको की उदाहरण के रूप में हेतु प्रस्तुत कर रहा है । इसी प्रकार आवरण भी शब्द को अव्यक्त करने का एक प्रकार है । स्वयं हेतु – शब्द उच्चारण के पूर्व उपलब्ध नहीं होता – प्रत्यक्ष प्रमाण है, न कि अनुमान प्रमाण । तथापि वह अनुमान प्रमाण भी हो सकता था, क्योंकि कोई भी प्रमाण या सिद्धान्त हेतु हो सकते हैं । उच्चारण से पूर्व शब्द का अभाव है, इसलिए वह अनित्य है, अर्थात् उच्चारण कारण है और शब्द उसका कार्य, और कार्य सदा अनित्य होता है – यहां निहित रूप से शेषवत् अनुमान का प्रयोग करके प्रतिज्ञा सिद्ध करी गई है ।

वात्स्यायन के कथनानुसार यदि हेतु होता – शब्द उच्चारण के पूर्व उपलब्ध नहीं है, जैसे ’अ’ के उच्चारण के पूर्व, तो वह जैसे किसी बच्चे को समझाया जा रहा हो, ऐसा लगता है, विद्वानों क्या, सामान्य जनों को भी उच्चारण के उदाहरण की आवश्यकता नहीं । इसी प्रकार उपर्युक्त पञ्चावयव में थाली का उदाहरण बड़ा अर्थहीन लगता है ! वास्तव में हेतु यही है कि जिसकी उत्पत्ति होती है, वह कार्य होता है, इसलिए अनित्य होता है । उत्पत्ति कहां हो रही है, वह वास्तविक हेतु है, न कि उत्पत्ति से अनित्यता का सम्बन्ध । वह तो स्पष्ट ही है । शब्द उत्पन्न होता है कि नहीं – यही तो प्रश्न है ! उसी को उदाहरण की अपेक्षा है । उसी का उदाहरण गौतम ने दिया है ।

उपर्युक्त से हम समझ सकते हैं कि द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में गौतम के दिए तर्कों को आजतक न्याय की भाषा में क्यों नहीं समझा गया है, और क्यों नैयायिक आजकल कुछ भी नया प्रमाणित करने में असमर्थ हैं । ’वह्निमान् पर्वतः’ के आगे यदि हमें जाना है, तो हमें गौतम के सूत्रों को सही रूप में समझना पड़ेगा ।


[1] साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा ॥१।१।३३॥

[2] उदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुः । तथा वैधर्म्यात् ॥१।१।३४-३५॥

[3] साध्यसाधर्म्यात् तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम् । तद्विपर्याद्वा विपरीतम् ॥१।१।३६-३७॥

[4] लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः ॥१।१।२५॥

[5] उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः ॥१।१।३८॥

[6] हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम् ॥१।१।३९॥