निरुक्त का एक अनुसन्धानात्मक विवेचन

वेद परमात्मा की देन हैं ,ऐसा वैदिक ऋषियों ने हमें बताया है । संस्कृत का स्रोत वेद होने से, फिर संस्कृत भी ईश्वरप्रदत्त भाषा माननी पड़ेगी । परमात्मा की कृति मानने पर संस्कृत की गहनता का रहस्य स्पष्ट हो जाता है ! इसीलिए वेदों को पढ़ने के लिए षड् अंगों का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है । इस हेतु मैंने पुनः यास्कीय निरुक्त का अध्ययन प्रारम्भ किया । शब्दों की दुरूहता के कारण मैंने सोचा कि इन शब्दों को वेद में देखकर इनको स्मरण करना सम्भवतः थोड़ा सरल हो जाए । पर वेदों से मिलान करते समय मुझे कुछ अनपेक्षित परिणाम मिले ! उन्हीं का निरूपण मैंने इस लेख में किया है ।

पुरातन काल में सम्भवतः अनेक निघण्टु व निरुक्त प्रचलित थे जिनका कुछ विवरण हमें आज मिलता है, परन्तु अद्यतन केवल यास्काचार्य के द्वारा संग्रहीत निघण्टु व उनका उस पर भाष्य निरुक्त ही हमें उपलब्ध होते हैं । अपने भाष्य के आरम्भ में ही वे कहते हैं, “छन्दोभ्यः समाहृत्य समाहृत्य समाम्नाताः” – अर्थात् वेदों से चुन-चुन कर निघण्टु के इन शब्दों को संग्रहीत किया गया है । शब्दों के अर्थ उनके साथ पठित हैं । निरुक्त में यास्क ने उन शब्दों का निर्वचन  दर्शाया है जिससे पदों के अर्थ और खुल कर सामने आते हैं । इस ग्रन्थ का प्रयोजन दुरूह वैदिक शब्दों को स्पष्ट करना है ।

अब इतने सारे असम्बद्ध शब्दों के अर्थों को मस्तिष्क में बैठाने में असमर्थ होने पर मैंने सोचा कि क्यों न इन शब्दों और उनके विभिन्न अर्थों को वेदों में जानकर समझा जाए । इस कार्य के लिए मेरे पास कुछ सामग्री उपलब्ध थी – वेदकोश डॉट कॉम (www.VedKosh.com) द्वारा ऐक्सेल में टंकित वेद संहिताऐं । उन सभी महानुभावों का बहुत धन्यवाद है जिन्होंने महीनों, संभवतः वर्षों, के प्रयास से यह महान कार्य सम्पन्न किया है !

अब हम सभी जानते हैं कि संस्कृत में विभक्ति, सन्धि, समास, आदि, अनेकों प्रक्रियाओं के कारण शब्दों के स्वरूप, विशेषकर उनके अन्त, परिवर्तित हो जाते हैं । जबकि उपर्युक्त फाइल में पदच्छेद भी उपलब्ध कराया गया है, तथापि विभक्ति, समास, आदि का कोई विच्छेद नहीं होता और शब्द का अन्वेषण करना कठिन हो जाता है । इसलिए मैंने पहले कुछ लम्बे पद चुने, जिनके आरम्भिक भाग को लेकर सर्च किया जा सकता था, जो भाग विकृत नहीं होते । इन सर्चों में मुझे कुछ विस्मित करने वाले तथ्य मिले ! मेरे संज्ञान में किसी और ने वेदों के साथ निघण्टु  के शब्दों और निरुक्त के अर्थों का मिलाप नहीं किया है । इसलिए ये परिणाम मैं सभी के साथ सांझा करना चाहती हूँ ।

निघण्टु  १|१७ में मुझे कुछ ऐसे शब्द प्राप्त हुए जो पर्याप्त लम्बे थे, यथा – कल्मलीकिनम्, जञ्जणाभवन्, मल्मलाभवन्, जिनका अर्थ जलता हुआ होना है (ज्वलतो नामधेयानि) । प्रथमतः, कल्मलीकिनम् को लेते हुए मैंने उसे चारों वेदसंहिताओं में ढूँढ़ा, तो वह केवल एक स्थान पर प्राप्त हुआ – ऋग्वेद २|३३|८ में, जहां उसका अर्थ जलता हुआ ही था । केवल एक बार देखकर मुझे आश्चर्य हुआ, तथापि विचित्र शब्द होने के कारण उसका निघण्टु  में पाया जाना उपयुक्त लगा । फिर जञ्जणाभवन् उठाया, तो वह भी केवल एक स्थान पर प्राप्त हुआ – ऋग्वेद ८|४३|८, जहां वह ज्वलन अर्थ में ही था । अबकी बार अवश्य मुझे थोड़ी निराशा हुई – यह शब्द तो ‘ज्वल दीप्तौ’ धातु के समीप होने से अध्येता द्वारा स्वयं व्युत्पन्न किया जा सकता था… पुनः, मल्मलाभवन् ढूँढ़ा । आश्चर्य ही आश्चर्य – यह तो चारों संहिताओं में कहीं था ही नहीं ! अब मुझे वस्तुतः बहुत चिन्ता होने लगी कि निरुक्त पढ़ने का कोई लाभ है भी कि नहीं… परन्तु अध्ययन को छोड़ देने से पहले मैंने कुछ और शब्दों का अन्वेषण करना आवश्यक समझा ।

   निघण्टु १|१३ में दिए नदीनामों में से मैंने खादोअर्णाः[1] को चुना । यह भी मुझे केवल ऋग्वेद ५|४५|२ मन्त्र में प्राप्त हुआ और वह नदी के विशेषण के रूप में ही प्रयुक्त था । ‘अर्णः’ स्वयं निघण्टु १|१२ में उदक नामों में पढ़ा गया है । सो, महर्षि दयानन्द सरस्वती ने उपरिपठित मन्त्र में खादोअर्णाः के अर्थ स्पष्ट किए – “खादो भक्षणीयान्यन्नानि वा यान्यर्णांसि यासु ताः” अर्थात् जिनमें खाने योग्य अन्न या जल हों, ऐसी नदियां ।

इसी मन्त्र में नदी के लिए एक और विशेषण आता है – धनवर्णसः, जो भी पर्याप्त दुरूह है । इस पद को यास्क ने निघण्टु में संग्रहीत नहीं किया है । इससे संग्रहण में कुछ न्यूनता प्रतीत होती है ।

नदीनामों में ही अन्यतम संज्ञा दी गई है – रोधचक्राः । अन्वेषण करने पर यह दो स्थलों पर प्राप्त हुई । ऋग्वेद १|१९०|७ में वह नदीवाची शब्द ही है, जिसे महर्षि ने इतरेतर द्वन्द्व पूर्वक बहुव्रीहि समास मानकर अर्थ किया है – रोधाश्चक्राणि च यासु ताः नद्यः – अर्थात् जिनमें अवरोधक मेढ़ वा भवंर हों, ऐसी नदियां । परन्तु अथर्ववेद ५|१|५ में द्विवचन में ‘रोधचक्रे’ पद मिलता है जो कि नदीवाची न होकर सृष्टि के दो किनारों पर स्थित चक्रों के अर्थ में प्रो० विश्वनाथ विद्यालंकार जी ने लिया है । जबकि यह अर्थ हमें निरुक्त में प्राप्त नहीं होता, तथापि हम इसको सृष्टि गंगा के किनारों पर स्थित चक्रों के रूप में समझ सकते हैं । सो, यहाँ भी नदी अर्थ कुछ खींच कर बैठ जाता है ।

फिर मैंने अश्वनामों (निघण्टु १|१४) में से दधिक्राः और दधिक्रावा का चयन किया । अन्ततः, मुझे एक ऐसा पद मिला जो अनेकों मन्त्रों में प्राप्त था ! इन मन्त्रों को मैंने तालिका के रूप में नीचे प्रस्तुत किया है । यहां दधिक्राव्णः आदि रूप भी सम्मिलित हैं । तालिका देखने से पहले हम ‘दधिक्राः’ के अर्थ देख लेते हैं – तत्र दधिक्रा इत्येतद्दधत् क्रामतीति वा, दधत् क्रन्दतीति वा, दधदाकारी भवति वा । तस्याश्ववद्देवतावच्च निगमा भवन्ति (निरुक्त २|२८) – अर्थात् “जो किसी वस्तु (अश्व के अर्थ में ‘घुड़सवार’) को धारण करके चले, या वस्तु को धारण करके शब्द करे (अश्व के अर्थ में ‘हिनहिनाए’), या वस्तु को धारण करके एकाकार हो जावे (जैसे घोड़ा सवार का ही जैसे भाग बन जाता है), वह ‘दधिक्राः’ कहलाएगा । इस पद के अश्ववत् और देवतावत् वेद में प्रयोग प्राप्त होते हैं ।” उपर्युक्त तीनों ही अर्थ अश्व को सुन्दरता से कहते हैं ! ‘दधिक्रावा’ के भी यही निर्वचन हैं, दोनों पदों में विशेष भेद नहीं है ।

अब वेदों में इन पदों के अर्थ देखते हैं –

क्रमसं०मन्त्र-संकेत मन्त्र में अर्थ टिप्पणी
ऋग्वेद ३|२०|१अश्वनामवत्, उषा से सम्बद्धहिन्दी व्याख्या में महर्षि दयानन्द ने अद्भुत अर्थ किए हैं – संसार के धारणकारकों का उल्लंघनकर्ता । इस प्रकार उन्होंने शब्द के निर्वचन का यौगिक रूप स्वीकार कर, अर्थ को अश्व से बहुत दूर ला बैठाया! तथापि सीमित अर्थ में अश्व की उपमा मानी जा सकती है, इसलिए मैंने ‘अश्वनामवत्’ शब्द का प्रयोग किया है । मन्त्र में ‘उषा’ पद का भी प्रयोग आता है । इसलिए मैंने ‘दधिक्राः’ पद को उषा से सम्बद्ध बताया है ।
ऋग्वेद ३|२०|५अश्वनामवत्, उषा से सम्बद्धपुनः यहाँ महर्षि ने बहुत विराट् अर्थ लिए हैं – भूमि आदि धारण करने वाले पदार्थों को उल्लंघन करके वर्तमान ।
३-५ऋग्वेद ४|३८|२,९,१०अश्वनामवत् (वैसे मन्त्र २-१० की देवता दधिक्राः होने से, ३-८ मन्त्रों में भी दधिक्राः को उपस्थित जानना चाहिए)यास्क मुनि ने इस सूक्त वा अन्य निम्नलिखित सूक्तों, जिनमें दधिक्राः/दधिक्रावा देवता है, उनके कारण दधिक्रा/दधिक्रावा को देवतावत् बताया है । 
६-११ऋग्वेद ४|३९|१-६यौगिक अर्थ, उषा से सम्बद्धपुनः, सभी छः मन्त्रों की देवता दधिक्राः है । यहां अश्व अर्थ लेना असम्भव है ।     
१२-१५ऋग्वेद ४|४०|१-४उषा का अर्थ  मन्त्रों की देवता दधिक्रावा है । यहां अश्व अर्थ लेना असम्भव है ।
१६  ऋग्वेद ७|४१|६अश्वनाम, उषा से सम्बद्ध 
१७-२१ऋग्वेद ७|४४|१-५  अश्वनामवत्, उषा से सम्बद्ध 
२२-२३यजुर्वेद ९|१४-१५अश्वनाममन्त्रऋषि – दधिक्रावा । मन्त्रों में अश्व के गुण भली प्रकार दिए हुए हैं ।
२४यजुर्वेद २३|३२अश्वनाम 
२५यजुर्वेद ३४|३९अश्वनाम, उषा से सम्बद्ध 
२६सामवेद पू० ३५८अश्वनामवत् 

इस एक शब्द की सर्च से हम पाते हैं कि, २६ मन्त्रों में दधिक्राः और दधिक्रावा अश्व के अर्थ में केवल ५ बार आया है । जहां-जहां मैंने ‘अश्वनामवत्’ कहा है, वहां वस्तुतः यौगिक अर्थ ही प्रयुक्त हुआ है, परन्तु अन्य अश्वपदवाचियों के भी मन्त्र में स्थित होने से अश्व की उपमा सम्भव लगती है । १० मन्त्रों में यह अर्थ करना असम्भव है, उषा का अर्थ ही दीख पड़ता है । यह भी ध्यान देने योग्य है कि केवल ३ मंत्रों में इन पदों का उषा से सम्बन्ध नहीं है । इस घनिष्ठ सम्बन्ध का कारण मुझे यह प्रतीत होता है कि उषा सूर्य को जैसे धारण करके लाती है, और फिर दिन के रूप में उससे एकाकार हो जाती है । वेदों में सूर्य के सात घोड़ों के रथ की उपमा के कुछ समान यह उपमा है । अन्यत्र, सृष्टि विषय भी प्राप्त हो रहा है । यह भी ध्यान देने योग्य है । हिनहिनाने का अर्थ मुझे कहीं भी प्राप्त नहीं हुआ । सो, मानना पड़ेगा कि निघण्टु/निरुक्त में पढ़े नदी, अश्व, आदि, अर्थ मार्गदर्शक के रूप में हैं, और निर्वचन प्रायः अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं । यह निर्णय अन्वेषणीय है ।

इस पूरे प्रयोग से हम कुछ निष्कर्ष निकाल सकते हैं –

  • निघण्टु/निरुक्त में पढ़ी सभी संज्ञाएं वेद संहिता में प्राप्त नहीं होतीं । सम्भव है वे किसी शाखा ग्रन्थ में या ब्राह्मण, आरण्यक, आदि में प्राप्त हों ।
  • निघण्टु/निरुक्त में पढ़ी संज्ञाओं के सभी अर्थ पठित नहीं हैं ।
  • कुछ पद (जैसे उपर्युक्त ‘धनवर्णसः’) जो पठित होने चाहिए, वे सूचित नहीं हैं ।
  • पठित अर्थों (नदी, अश्व, आदि) की अपेक्षा, निरुक्त में दिए यौगिक अर्थ कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं । यास्क ने कुछ ऐसे भी अर्थ कर दिए हैं जो वेदों में तो प्रयुक्त नहीं हैं, परन्तु किसी और ग्रंथ के लिए उपयोगी हो सकते हैं ।

यहाँ मैंने कुछ ही शब्दों के अन्वेषण का चित्रण किया है । अवश्य ही निघण्टु के सभी शब्दों का प्रयोग वेदों में ढूँढ़ा जाना चाहिए और निरुक्त में दिए अर्थों से उनके अर्थों का मिलान करना चाहिए । निरुक्त में तो निघण्टु के कुछ ही पदों का निर्वचन प्राप्त होता है – अर्थ के अनुसार, और स्वामी दयानन्द के भाष्य के अनुसार, हमें अन्य पदों का भी निर्वचन करना चाहिए । इन यौगिक अर्थों से वेदों के अर्थ और स्पष्ट होंगे और अन्य अर्थ भी सम्भवतः प्राप्त होंगे, क्योंकि जो अर्थ हम एक स्थान पर पाएंगे, उसे दूसरे स्थान पर भी लेने पर एक नया अर्थ प्राप्त हो सकता है । स्वयं निघण्टु में कुछ पद जोड़े जा सकते हैं, जिनका भी निर्वचन बहुत उपयोगी रहेगा । आशा है कुछ विद्यार्थी इस अनुसन्धान को आगे बढ़ाएंगे !


[1] यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि वेदों में अनेक ऐसे शब्द हैं जहां स्वरसन्धि नहीं होती । यह भी शोध का विषय होना चाहिए कि कितने ऐसे पद हैं और सन्धि न् होने के क्या-क्या कारण हैं ।