पौराणिक कथाओं की वेद से कल्पना
अपने लेख ‘वेद में शिव’ में मैंने प्रदर्शित किया है कि पुराणों को जो वेदों पर आधारित बताया जाता है, सो शिव की कल्पना का स्रोत तो दृष्टिगोचर होता है । उसके कई अंश वेद-मन्त्रों के विकृत अर्थ द्वारा रचे गए हैं । उसी श्रृंखला में इस लेख में मैं दधीचि की पौराणिक कथा के वैदिक स्रोत पर प्रकाश डाल रही हूं । बृहदारण्यकोपनिषद् पढ़ते समय मुझको इसका बोध हुआ । बृहदारण्यक में दधीचि को दध्यङ् पुकारा गया है और वेदों में भी प्रायः यही प्रयोग मिलता है, परन्तु ये दोनों नाम एक ही हैं – किंचित् प्रत्यय-भेद है, और कुछ नहीं । अनेकों वेदमन्त्रों के ऋषि ’दध्यङ् आथर्वण’ हैं । अथर्वा ऋषि के पुत्र होने के कारण, दधीचि को आथर्वण भी कहा गया है, ऐसी मान्यता है ।
पुराणों (विशेषकर भागवत पुराण), महाभारत, आदि, में दधीचि के विषय में दो कथाएं मुख्यरूप से प्राप्त होती हैं । पहले में, इन्द्र ने दृढ़-योगी दध्यङ् ऋषि को प्रवर्ग्य और मधु विद्या दी, परन्तु देने के उपरान्त कहा कि यदि आप इस विद्या को किसी और को कहेंगे तो मैं आपका शिरोच्छेदन कर दूंगा । कुछ समय बाद, ऋषि की ख्याति सुन, अश्विनी अथवा अश्वी कुमार उनसे मधु विद्या सीखने आए । ऋषि की कठिनाई जानकर उन्होंने कहा कि हम आपका सिर काटकर अन्यत्र सुरक्षित रख देंगे, जिससे विद्या देते समय इन्द्र आपको पहचान न पाए; बाद में, हम आपका शिर पुनः स्थापित कर देंगे । उन्होंने ऐसा ही किया, परन्तु इन्द्र को तब भी ज्ञात हो गया । इन्द्र ने वज्र से अश्वशिरधारी ऋषि का सिर काट दिया । तब अश्वी कुमारों ने दधीचि का अपना शिर पुनः संयोजित कर के उनको पुनरुज्जीवित कर दिया । यह कथा शतपथ ब्राह्मण (१४।१।१) में भी पाई जाती है ।
दूसरी कथा में, दधीचि एक तपस्वी ब्राह्मण भी थे, और अत्यधिक शारीरिक शक्ति वाले भी । इसलिए उन्होंने अपने जीवनकाल में असुरों को पनपने नहीं दिया । परन्तु, जब उनका देहान्त हो गया, तब असुर सारी पृथिवी पर फैल गए । इन्द्र उनके राजा वृत्रासुर से लड़ना चाहते थे, परन्तु असमर्थ थे । तब उन्होंने दध्यङ् ऋषि को ढूढ़ना प्रारम्भ किया, तो ज्ञात हुआ कि दध्यङ् तो चल बसे, परन्तु उनकी अस्थियों से भी वृत्रासुर को परास्त किया जा सकता है । इसलिए उन्होंने दधीचि की हड्डियां ढूंढ़ कर, उनका वज्रायुध बनाया जिससे वे वृत्रासुर को मारने में सफल हुए । इस कथा के एक विकल्प में, जीवित दधीचि से ही देवों ने अस्थियां मांगीं । परम उदार होने के कारण, और देवों की सहायता करने की इच्छा से, दधीचि ने अपने प्राण स्वयमेव त्याग दिए ।
अब वेदमन्त्र देखिए, साथ-साथ उनके गौढ़ रूप से प्रतीत होने वाले अर्थ भी –
तद्वां नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।
दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाच ॥ ऋक्० १।११६।१२॥
(ऋषिः – कक्षीवान् । देवते – अश्विनौ)
अर्थात् “हे अश्विकुमारों ! दध्यङ् आथर्वण ने जिस मधु-विद्या को अश्व के सिर से आपको उपदेश दिया था, उस उग्र कर्म को मैं (कोई ज्ञाता) सबके लाभ के लिए प्रकाशित करता हूं, जिस प्रकार बिजली वर्षा की सूचना देती है ।” इस प्रकार इस मन्त्र में, बिल्कुल पौराणिक कथा के अनुसार, अश्विनी कुमारों को दध्यङ् आथर्वण के द्वारा, अश्व के सिर से, मधुविद्या का देना जैसे स्पष्टतः कहा गया है ।
आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।
स वां मधु प्रवोचदृतायन् त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ ऋक्० १।११७।२२॥
(ऋषिः – कक्षीवान् । देवते – अश्विनौ)
अर्थात् “हे अश्विकुमारों ! आथर्वण दधीचि के लिए आपने अश्व का सिर प्रत्यर्पित किया । (उस सिर से) उस ऋषि ने सत्य से परिपूर्ण होकर, आप दोनों को मधुविद्या और रहस्यमयी ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया ।” इस प्रकार इस मन्त्र ने भी पौराणिक कथा की पुष्टि कर दी ।
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीर्नव ॥ ऋक्० १।८४।१३॥
(ऋषिः – राहुगणो गोतमः । देवता – इन्द्रः)
अर्थात् इन्द्र ने, स्तब्ध होकर, दध्यङ् की अस्थियों से ९९ वृत्रों = असुरों को मारा ।
यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ् धियमत्नत ।
तस्मिन् ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ ऋक्० १।८०।१६॥
(ऋषिः – राहुगणो गोतमः । देवता – इन्द्रः)
अर्थात् जिस प्रकार पूर्व में इन्द्र से अथर्वा, मनु और दध्यङ् ने ब्रह्मविद्या और उक्थ प्राप्त किए, उसी प्रकार आप विद्वज्जन भी उसे प्राप्त करके स्वराज्य प्राप्त करें । ऋग्वेद के इस सूक्त के अन्य कुछ मन्त्रों में इन्द्र का वज्र के द्वारा वृत्र की हत्या भी बताई गई है ।
तमु त्वा दध्यङ्ङृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः ।
वृत्रहणं पुरन्दरम् ॥ यजु० ११।३३॥
(ऋषिः – भारद्वाजः । देवता – अग्निः)
अर्थात् “हे अग्ने ! अथर्वा ऋषि के पुत्र दध्यङ् ऋषि ने आप को प्रज्वलित किया, जो आप वृत्र का हनन करने वाले और पुरियों को नष्ट करने वाले हैं ।” इस प्रकार दधीचि के अथर्वा के पुत्र होने की भी पुष्टि हो गई ।
उपर्युक्त ऋग्वेद के मन्त्रों के भाष्य में सायण ने भी पौराणिक कथाओं का आश्रय लिया है । दोनों ही कथाओं के अधिकांश भागों की इन मन्त्रों में पुष्टि प्रतीत होती दीखती है । यहां तक कि बृहदारण्यकोपनिषद् में भी जैसे इन कथाओं का उल्लेख मिलता है । यथा – इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ’तद्वां नरा… (ऋ० १।११६।१२)’ इति ॥ बृ०उप० २।५।१६॥ – अर्थात् उपर्युक्त मधुविद्या को दध्यङ् आथर्वण ने दोनों अश्वियों को बोला । उस ’मधु’ को देखकर ऋषि ने यह मन्त्र बोला (आगे मन्त्र जैसे ऊपर दिया गया है) । (यहां हम यह भी पाते हैं कि ऋषि ने मन्त्र को देखकर बोला । परन्तु मन्त्र का ऋषि दध्यङ्ङाथर्वण नहीं है ! इस विषय पर कभी और चर्चा करूंगी ।) अगली कण्डिका में इन्हीं शब्दों का प्रयोग है, केवल मन्त्र उपर्युक्त ऋ० १।११७।२२ है ।
तो क्या वेदों में ऐसी अविश्वसनीय वा ऐतिहासिक कथा का उल्लेख माना जाए ? क्या पुराणों में अन्ततः वेद-प्रतिपादित ’सत्य’ ही दिया गया है ? ये दो प्रश्न हम आगे देखते हैं, परन्तु यह तो स्थापित हो गया कि दधीचि की कथा वेदों से ही प्रेरित है और कथावस्तु मन्त्रों के गौण अर्थों के अनुसार है ।
अब पहली कथा का गहन अर्थ यह है ।’दध्यङ्’ के विषय में महर्षि दयानन्द लिखते हैं – दधति यैस्ते दधयः सद्गुणास्तानञ्चति प्रापयति वा सः – अर्थात् जिसके द्वारा धारण किया जाता है, उसे ’दधि’ कहते हैं, अर्थात् सद्गुण क्योंकि उन्हीं से हम विद्या को धारण करते हैं । सद्गुणों (और विद्या) को जो प्राप्त करता और कराता है, वह दध्यङ् कहाता है । उपर्युक्त ’डुधाञ् धारणपोषणयोः’ ही नहीं, दध्यङ् की उत्पत्ति ’ध्यै चिन्तायाम्’ धातु से भी निरुक्त में की गई है, जब इसका अर्थ हुआ ’अत्यन्त ध्यान में मग्न होने वाला’ । दोनों अर्थों को मिला कर, हमें दध्यङ् के विशेष अर्थ जान पड़ते हैं – वह जिसने ज्ञान को ध्यान से भी पाया है, केवल गुरु से ही नहीं, अर्थात् साक्षात् करने वाला परम ज्ञानी । इसी बात की ध्वनि हमें उपर्युक्त ऋ० १।८०।१६ में इन्द्र के द्वारा दध्यङ् को विद्या के उपदेश में मिलती है । वहां ’इन्द्र’ का अर्थ ’परमात्मा’ है । दध्यङ् उस ऋषि को कहते हैं, जो सीधा परमात्मा की उपासना से ज्ञान प्राप्त करता है, जिसको योगदर्शन में इस प्रकार कहा गया है – ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा (१।४८) – अर्थात् समाधि की एक अवस्था में योगी को जैसे ज्ञान अपने आप प्राप्त होने लगता है ।
’अथर्वा’ = हिंसादिदोषरहितः, अर्थात् हिंसा आदि दोषों से जो रहित होता है, उसे अथर्वा कहते हैं । स्वार्थ में, जो ऐसी हिंसा आदि दोषों से रहित परम्परा में पोषित हुआ हो और उसकी रक्षा करता हो, उसे अथर्वा का ’पुत्र’ ’आथर्वण’ कहा गया है । और अथर्वा नाम परमात्मा का भी है, क्योंकि वह भी हिंसादि दोषरहित है । सो, जो उसके आदेशों का शब्दशः पालन करने वाला है, वह उसको पुत्र-समान प्रिय है । इस प्रकार निर्दोष और सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त और उनको प्राप्त कराने वाले उत्कृष्ट गुरु को ’दध्यङ् आथर्वण’ कहा गया है । यह किसी ऋषि-विशेष का अभिधेय नहीं है ।
’अश्व’ वह होता है जो शीघ्र गन्तव्य को प्राप्त करता है, व्याप्त हो जाता है । सो, जो आचार्य उच्च श्रेणी के होते हैं, उनको ऐसे शिष्यों का ग्रहण करना चाहिए जो कि मेधावी हों । मन्दबुद्धि छात्र के साथ आचार्य केवल अपना समय और परिश्रम नष्ट करेंगे । ऐसा शिष्य अश्व के समान ’अश्वी’ कहा गया है, और जो उनका जोड़ा बताया गया है, वह शिष्य और शिष्या का संकेत है – स्त्रियों को अच्छे आचार्य/आचार्या ग्रहण करके विद्यादान किया करें । मेधावी शिष्य-शिष्याओं को भी गुरु को सावधानी से चुनना चाहिए – वह दध्यङ् आथर्वण होना चाहिए ।
अब जब शिष्य आचार्य के पास आए, तो आचार्य को उसकी बुद्धि की क्षमता और ज्ञान का परीक्षण करके, उसके अनुसार अपने को ढालना चाहिए, जिससे कि शिष्य को सरलता से समझ में आ जाए । क्योंकि यहां शिष्य को अश्वी कहा गया है, इसलिए, उपमा को आगे बढ़ाते हुए, ऐसा कहा गया है कि आचार्य ने भी अश्व का सिर धारण कर लिया । क्योंकि यह धारण शिष्य के कारण हुआ, इसलिए अश्वियों ने ही आचार्य का सिर बदल दिया, ऐसी कथा है । फिर जब छात्र गुरु के समतुल्य हो गए, तो गुरु अपने अनुसार उनसे बात कर सकते थे, बात को सरल कर के बताने की आवश्यकता नहीं रही, अर्थात् उनका सिर जैसे उन्हें वापस मिल गया !
यहां जो मधुविद्या कही गई है, वह मोक्षविषयक विद्या है । इस विद्या के गुणगान वेदों और उपनिषदों में अनेकत्र पाए जाते हैं । यह परम विद्या कैसे कोई साधारण गुरु किसी साधारण शिष्य को दे सकता है ?! इसी लिए तो कहा गया है – आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ कठ० १।२।७॥ – उस ब्रह्मविद्या का जानने वाला और कहने वाला आश्चर्यजनक है, और, उससे शिक्षित होकर, उस विद्या को प्राप्त करने वाला भी अत्यन्त कुशल होगा ।
अब दूसरी कथा । जो इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों से वज्रास्त्र बनाया, सो पं० शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ जी ने यहां एक त्रुटि दिखाई है । ऊपर दिए ऋ०१।८४।१३ में ’अस्थभिः’ कहा गया है, न कि ’अस्थिभिः’, जिसका अर्थ पण्डित जी ने अस्त्र-शस्त्र-ग्रन्थ आदि किया है, न कि हड्डियां । सो ’दधीचि के अस्थों द्वारा’ का अर्थ हुआ ’विद्वानों द्वारा बनाए गए विविध अस्त्र, शस्त्र, ग्रन्थ, आदि’ । इन अस्त्रों और विद्याओं से इन्द्र, अर्थात् राजा, राष्ट्र के शत्रुओं का और अपनी प्रजा के अज्ञानरूपी शत्रु का विनाश करता है । यही उसका कर्तव्य है – अपने राज्य में, विद्वानों को प्रोत्साहन देकर, उनसे नई तकनीक के शस्त्र बनवाना जिससे वह बाह्य शत्रु पर भारी पड़ सके; और उन विद्वानों को विद्या को बढ़ाने को प्रेरित करना, जिससे वे नए ग्रन्थादि लिखकर, विद्या को अपने मरणोपरान्त आने वाली पीढ़ियों के लिए भी छोड़ जाएं । यही है दधीचि की मृत्यु का रहस्य !
जो ९९ असुरों (=शत्रुओं) के हनन की बात मन्त्र में कही गई है, वहां ९९ संख्या का भी अपना महत्त्व है । संख्याएं शून्य से लेकर ९ तक जाती है; उसके बाद बायीं ओर खिसक कर और बड़ी संख्या बनाती हैं, जैसे १ से ११ । इसका अर्थ हुआ कि नव संख्या अपने में सबसे बड़ी है । सो, ’९९’ में सम्पूर्णता का भाव है । अर्थात् विद्या और आविष्कार द्वारा प्रत्येक शत्रु का नाश किया जा सकता है ।
महर्षि दयानन्द ने उपर्युक्त मन्त्रों के, अपने ऋषित्व द्वारा, अन्य ही अर्थ किए हैं । क्योंकि वेदमन्त्रों के अनेक अर्थ होते हैं, इसलिए इसमें कुछ बाधा नहीं है । दूसरी ओर, हम पुनः यह देखते हैं कि पुराणों के काल तक वेदों के ज्ञान का कितना ह्रास हो गया था कि उन्होंने मन्त्रों के सामान्य अर्थ करके उनको एक मनगढ़न्त कथा में बुन दिया । तीसरी बात यह भी सम्पुष्ट हो जाती है कि वेदों में ऋषि आदियों का इतिहास नहीं है, और सर्वत्र यौगिक अर्थ का ही ग्रहण करना चाहिए । वेद के अलंकार कभी-कभी कठिन हो सकते हैं । तब हमें ऋषियों के मार्गदर्शन की आवश्यकता अधिक होती है । वे ही हमें सही पथ पर ले जाते हैं । सायण आदियों द्वारा किए गए वेदभाष्य वेदों से हमें विमुख ही कर देते हैं ! हमें भी वेद और अन्य ऋषिकृत ग्रन्थ धरोहर में मिले हैं जिससे कि हम पुरातन उत्कृष्ट विद्या को पुनः नवीन कर सकते हैं, और संसार में पापों और कष्टों का नाश करके, सुख-शान्ति फैला सकते हैं ।
