मन्त्रार्थ में ऋषि व देवता से अर्थनिर्धारण

वेदमन्त्रों के अर्थ में उसपर दिए ऋषि व देवता का विशेष महत्त्व है, इसे आपने मेरे लेखों द्वारा अब तक सम्भवतः जान लिया होगा । अब इस तथ्य को जब तक दृष्टान्त द्वारा समझा न जाए तब तक उसको मन में बैठाना सरल नहीं है । वैसे तो मैं कोई ऋषिका नहीं हूं, तथापि यहां मेरी ओर इस दिशा में एक छोटा सा प्रयास है । आशा है इससे प्रेरित होकर अन्य वेदाध्येता इस विषय पर और शोध करेंगे ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक मन्त्र अपने अनेकों ग्रन्थों में उद्धृत करके प्रसिद्ध कर दिया । वह है –

हिरण्यगर्भः  समवर्तताग्रे  भूतस्य  जातः  पतिरेक  आसीत ।

स  दाधार  पृथिवीं  द्यामुतेमां  कस्मै  देवाय  हविषा  विधेम ॥

इस मन्त्र की विशेष बात यह है कि वेदों में भी यह अनेक बार आया है – कुल मिलाकर पांच बार ! इससे ज्ञात होता है कि यह मन्त्र कितना महत्त्वपूर्ण है । यहां तक कि इस मन्त्र से सम्बद्ध तीन और मन्त्र – “यः  प्राणतो  निमिषतो, यस्येमे  हिमवन्तो  महित्वा, य  आत्मदा  बलदा” – जो महर्षि ने अपने ग्रन्थों में एक बार साथ में गिनाए हैं, वे भी इस मन्त्र के आगे-पीछे इन स्थलों में चार बार पाए जाते हैं । विस्तरभय से हम उनकी चर्चा यहां नहीं करेंगे ।

अब यदि हम यह समझें कि इन पांचों स्थानों पर उपर्युक्त मन्त्र का अर्थ एक ही है, जैसा कि इस समय प्रायः समझा जाता है, तो वेदों में पुनरुक्ति दोष आ जायेगा, जिसके अनुसार किसी विषय को ग्रन्थ में पुनः पुनः कहना ग्रन्थ में दोष होना कहा गया है । निरुक्त कहता है, “यथाकथा  च  विशेषोऽजामि  भवति (निरु० १०।१६)” – (वेद में दौहराए मन्त्रों का) किसी न किसी प्रकार से अर्थभेद होता ही है । न्यायदर्शन भी कहता है, “अनुवादोपपत्तेश्च (वेदेषु  पुनरुक्तिदोषः  नास्ति) (न्याय० २।१।६१)” – अर्थात् वेदों में जो कुछ पदों/वाक्यों का दौहराना दीखता है, वह ‘अनुवाद’ = सार्थक श्रेणी में आता है, उस दौहराने का कोई विशेष प्रयोजन होता है । आज भी हम ऐसे ग्रन्थ को हीन-दृष्टि से देखेंगे जिसमें एक ही विषय को अनेक बार कहा गया हो, क्योंकि कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति इसको स्वीकार नहीं कर सकता ।

अच्छा तो फिर इन पांचो स्थलों में भिन्न-भिन्न अर्थ अथवा कोई विशेष प्रयोजन मान लेते हैं । पर वे अर्थ/प्रयोजन हैं क्या ? उनका कैसे निर्धारण किया जाए ? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए महर्षि का भाष्य तो देखेंगे ही, परन्तु वह पांच में से केवल तीन मन्त्रों के लिए उपलब्ध है । निरुक्त में कुछ अन्य ही व्याख्या प्राप्त होती है । इन सब कठिनाइयों का पार पाने के लिए ऋषि और देवता का ज्ञान करना अनिवार्य हो जाता है । और जब हम इस दिशा में खोज करते हैं, तो अपेक्षानुसार पांचों स्थलों पर हमें इन दोनों में भेद प्राप्त होता है । ये भेद नीचे की तालिका में संग्रहीत हैं –

संकेतऋषिदेवताअन्य भेद
ऋक्० १०।१२१।१प्राजापत्यो हिरण्यगर्भःकः
यजु० १३।४हिरण्यगर्भःप्रजापतिः
यजु० २३।१प्रजापतिःपरमेश्वरः
यजु० २५।१०प्रजापतिःहिरण्यगर्भः
अथर्व० ४।२।७वेनःआत्मादूसरी पंक्ति का आरम्भ : स दाधार पृथिवीमुत द्यां …

ये भेद बहुत ही अद्भुत हैं ! आज तक हमने सम्भवतः इन पर ध्यान भी न दिया हो…  

इससे पहले कि हम इन भेदों का अर्थ पर प्रभाव देखें, हम मन्त्र की प्रचलित व्याख्या देख लेते हैं : “(अग्रे) सृष्टि के आदि में (हिरण्यगर्भः) सूर्यादि ज्योति-पुञ्ज जिस परमात्मा के गर्भ में हैं, वह (सम् + अवर्तत) भली प्रकार वर्तता था (शेष दो प्रकृति और जीवात्माएं सुप्तावस्था में थीं, केवल वही अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य के साथ ‘जागता’ था) । (सृष्टि हो जाने पर) वह (एकः) अकेला असहाय = जिसको किसी अन्य के सहाय की आवश्यकता नहीं थी (जातः) प्रादुर्भुत हुए (भूतस्य) पदार्थों और प्राणियों का (पतिः) पालन कर्ता व रक्षक (आसीत्) था । (स) वह (इमाम्) इस (पृथिवीम्) अप्रकाशमान् पृथिवी-प्रभृति लोकों (उत) और (द्याम्) प्रकाशमान् सूर्य-प्रभृति पिण्डों को (दाधार) धारण करता है । उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) दिव्यगुणसम्पन्न परमात्मा के लिए (हविषा) उपासना रूप हवि द्वारा (विधेम) हम अपने को समर्पित करें ।” परमात्मा और जीवात्मा विषयक होने से ये आध्यात्मिक अर्थ हैं जो कि स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेद के मन्त्र की व्याख्या के रूप में अपने अन्य ग्रन्थों में दिए हैं (क्योंकि ऋग्वेद के इस भाग की महर्षि-व्याख्या उपलब्ध नहीं है ।

निरुक्त में प्रायः आधिदैविक अर्थ ही ग्रहण किए गए हैं । इसलिए वहां पर इसी ऋग्वैदिक मन्त्र के अर्थ पर्याप्त भिन्न हैं – “कः  कमनो  वा क्रमणो  वा  सुखो  वा । हिरण्यगर्भो  हिरण्यमयो  गर्भो,  हिरण्यमयो  गर्भोऽस्येति  वा । गर्भो  गृभेर्गृणात्यर्थे, गिरत्यनर्थानिति  वा । यदा  हि  स्त्री  गुणान्  गृह्णाति,  गुणाश्चास्या  गृह्यन्ते,  गर्भो  भवति । समभवदग्रे  भूतस्य  जातः  पतिरेको  बभूव । स  धारयति  पृथिवीं  च  दिवं  च । कस्मै  देवाय  हविषा  विधेमेति  व्याख्यातं, विधतिर्दानकर्मा (निरु० १०।२३)॥ – अर्थात् ‘क’ का अर्थ है कमनीय, क्रमण = गति करने वाला और सुखरूप । ‘हिरण्यगर्भ’ का अर्थ है हिरण्यमय = चमकीला गर्भ अथवा जिसका ऐसा गर्भ हो, वह । ‘गर्भ’ बना है ‘गृभि’ धातु (पाणिनीय धातुपाठ में नहीं पढ़ी हुई) से, गृणाति = स्तुति अथवा उपदेश करने के अर्थ में; या ‘गृ निगरणे (तुदा०)’ से अनर्थों को निगलने वाले के अर्थ में (आगे दिए वाक्यों से ग्रहण करने के अर्थ में भी) । जब ही स्त्री (पुरुष के वीर्य के) गुणों को ग्रहण करती है, और उसके (रज के) गुणों को ग्रहण किया जाता है (कोषिका में), तब गर्भ होता है । … ‘विधेम’ विधति = दान करने के अर्थ में ।” इससे स्पष्ट होता है कि यास्क ने यहां हिरण्यगर्भ से भ्रूण अर्थ लिया है । श्री चन्द्रमणि विद्यालंकार पालीरत्न जी ने अपने निरुक्त-भाष्य में ‘क’ के प्राणवायु अर्थ बताए हैं, क्योंकि वह कमनीय होता है, सारे शरीर में गति करता है और प्राणियों के लिए सुखकारी होता है । तब मन्त्र के अर्थ हुए – “(जीव की उत्पत्ति में) सबसे पहले जीवन-ज्योति-रूप, अथवा चेतन जीवात्मा की ज्योति जिसके गर्भ में हो, वह प्राण उत्पन्न होता है । सभी प्राणियों का वह अकेला पति = पालक व रक्षक होता है – शरीर-धारण का आधार होता है ।[1] जीव में वह प्राण पृथिवी = शरीर के पार्थिव अंश और द्यौ = शरीर के तेज को धारण करता है । उस कमनीय, गतिमान्, सुखकारी प्राण को हम सात्त्विक अन्न का दान करें ।”

अब अन्य उपलब्ध अर्थों को देखते हैं :

यजुर्वेद १३।४ – यहां अर्थ प्रचलित अर्थ के समान ही है, परन्तु दो विशेषताएं ध्यान देने योग्य हैं : १) महर्षि ने विषय बताया है – “किं स्वरूपं ब्रह्म जनैरुपास्यमित्याह” अर्थात् ‘ब्रह्म के किस प्रकार का स्वरूप मनुष्यों के द्वारा उपास्य है, यह कहा गया है’ । २) ‘जातः’ को महर्षि ने ‘पतिः’ का विशेषण लेते हुए, ‘जनक’ अर्थ किया है ।

यजुर्वेद २३।१ – यहां भी अर्थ प्रचलित अर्थ के अनुरूप ही है, परन्तु दो विशेषताएं पुनः ध्यान देने योग्य हैं : १) महर्षि ने विषय लिखा है – “अथेश्वरः किं करोत्याह” अर्थात् ‘परमात्मा क्या करता है, यह कहा गया है’ । २) ‘जातः’ को महर्षि ने पुनः ‘पतिः’ का विशेषण लेते हुए, ‘प्रादुर्भूत’ अर्थ किया है ।

यजुर्वेद २५।१० – यहां  पुनः अर्थ प्रचलित अर्थ के समान ही है, और ध्यान देने योग्य विशेषताएं इस प्रकार हैं : १) महर्षि ने विषय बताया है – “अथ परमात्मा कीदृशोऽस्तीत्याह” = ‘परमात्मा किस प्रकार का है, यह कहा गया है’ । यह यजुर्वेद १३।४ के समान है, तथापि उपासना का अर्थ यहां नहीं आया है । २) ‘जातः’ को महर्षि ने ‘भूतस्य’ का विशेषण मानते हुए और षष्ठ्यर्थे प्रथमा लेते हुए, प्रादुर्भूत (जगत्) अर्थ किया है । ३) इस मन्त्र के आगे के उपर्युक्त तीन मन्त्रों ‘यः प्राणतो’, ‘यस्येमे हिमवन्तो’ और ‘य आत्मदा’ में सूर्य अर्थ ग्रहण किया गया है, जबकि अन्य स्थलों पर इन मन्त्रों में भी परमात्मा अर्थ ही ग्रहण हुआ था; ‘य आत्मदा’ में साथ-साथ द्वितीय परमात्मा अर्थ भी ग्रहण किया गया है । इससे प्रतीत होता है कि ‘हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे’ मन्त्र में भी सूर्य अर्थ सम्भव हो सकता है ।

अथर्व० ४।२।७ – यहां  पुनः प्रचलित अर्थ ही दिया जाता है ।

सम्भव है कि ‘जातः’ के अर्थभेद का कुछ विशेष महत्त्व न हो, परन्तु निर्दिष्ट विषय में भेद और सूर्य अर्थ का अवश्य महत्त्व प्रतीत होता है ।

अब ऋषि और देवता के भेद के अनुसार, साथ-साथ सन्दर्भ को देखते हुए, हम इन पांचों मन्त्रों के अर्थभेद को जानने की चेष्टा करते हैं । इनमें अथर्ववेद सबसे सरल प्रतीत होता है, इसलिए सबसे पहले उसे ही लेते हैं । यहां ऋषि है ‘वेनः’ जिसका अर्थ महर्षि ने यजु० १३।३ में ‘कमनीय’ किया है । देवता है ‘आत्मा’ जिसका अर्थ कभी परमात्मा होता है और कभी जीवात्मा । यदि हम आगे पीछे के मन्त्र देखें तो वहां जलों में गर्भ-धारण की बात कही गई है । यहां तक कि ८वें मन्त्र में कहा गया है – “आपो  वत्सं  जनयन्तीर्गर्भमग्रे  समैरयन् । तस्योत  जायमानस्योल्ब  आसीद्धिरण्ययाः  कस्मै  देवाय  हविषा  विधेम ॥” – अर्थात् सन्तान को जन्म देते हुए, जल पहले गर्भ को प्रेरित करते हैं (सकुचाना प्रारम्भ करते हैं) । उस उत्पन्न होते हुए की जार ‘हिरण्यय’ होती (=कहलाती) है । उस कमनीय देव का हवि द्वारा सेवन करें ।” जबकि यहां सृष्ट्युत्पत्ति का प्रकरण भी सम्भव है, तथापि ‘कमनीय (प्राण)’ ऋषि और ‘आत्मा (=जीवात्मा)’ से यहां निरुक्त-वर्णित अर्थ ही अभिप्रेत हैं, ऐसा सम्यक् विश्वास से कहा जा सकता है ।

ऋग्वैदिक मन्त्र का ऋषि है ‘प्राजापत्यो हिरण्यगर्भः’ और देवता है ‘कः’ । ‘प्राजापत्यो हिरण्यगर्भः’ का अर्थ है ‘प्रजापति से सम्बद्ध हिरण्यगर्भ’ । जबकि ‘प्रजापति’ शब्द लौकिक भाषा में परमेश्वर के लिए ही प्रयुक्त होता है, तथापि इसके यौगिक अर्थ ‘प्रजाओं का रक्षक राजा’ अथवा ‘प्रजा की कामना करने वाला पुरुष’ भी होते हैं । ‘कः’ का अर्थ ‘कमनीय, गतियुक्त, सुख’ हमने निरुक्त के आधार से देखा । यदि हम सन्दर्भ देखें तो, उपर्युक्त चार मन्त्रों के बाद, कुछ अन्य मन्त्र भी ऐसे आते हैं जिनके ब्रह्माण्ड अर्थ अधिक आसानी से घटते हैं, परन्तु जीव-गर्भ के अर्थ भी हो सकते हैं । फिर यह श्लेषालंकार और भी गहन हो जाता है जब इस प्रकार के वचन मिलते हैं –

आपो  ह  यद्बृहतीर्विश्वमायन्  गर्भं  दधाना  जनयन्तीरग्निम् । ततो  देवानां  समवर्ततासुरेकः  कस्मै…॥

यश्चिदापो  महिना  पर्यपशयद्दक्षं  दधाना  जनयन्तीर्यज्ञम्  । यो  देवेष्वधि  देव  एक  आसीत्  कस्मै…॥ऋ० १०।१२१।७-८॥

अर्थात् “महान् जल, गर्भ को धारण करते हुए, अग्नि (=ज्ञानयुक्त जीव) को जन्म देते हुए, सब (जगत्) को प्रकट (जीव के लिए) करते हैं । तब देवों (=इन्द्रियों) का (=में) एक प्राण वर्तता है ॥ जलों का, अपने महत्त्व द्वारा, वेग को धारण करते हुए, यज्ञ (करने वाले जीव) को जन्म देते हुए जो भली प्रकार से देखता है, वह देवों में जो श्रेष्ठ देव (प्राण) है (उसे जान लेता है) ।” आगे के दो प्रसिद्ध मन्त्र “मा नो हिंसीज्०” और “प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो०” तो केवल जीव पर ही घटते हैं, प्रार्थनाविषयक हैं, उनमें सृष्ट्युत्पत्ति का प्रकरण नहीं घटता । इस सब से प्रतीत होता है कि यहां ‘प्राजापत्यो हिरण्यगर्भः’ का अर्थ ‘प्रजा की इच्छा रखने वाले से सम्बद्ध जारयुक्त स्त्रीगर्भ’ और ‘कः’ से ‘जीवन का सुख’ अभिप्रेत हैं । सो, प्रकृत मन्त्र में ‘हिरण्यगर्भ’ से ‘प्राण’ अभिप्रेत होते हुए, अर्थ हुआ तो अथर्ववेद के मन्त्र के समान, परन्तु उसका परिपेक्ष क = जीव को भोग और अपवर्ग के सुख को प्राप्त करने का उपदेश है, जो उपदेश सम्पूर्ण सूक्त में भी व्याप्त है । श्लेषालंकार से सृष्ट्युत्पत्ति विषय भी पूर्ववत् है, परन्तु उस दशा में मन्त्र का विषय होगा ‘परमात्मा के प्रयोजन के समझकर, आत्मा का जीवन में भोग और अपवर्ग के द्वारा सुख की प्राप्ति’ ।

 यजु० १३।४ – यहां ऋषि ‘हिरण्यगर्भः’ और देवता ‘प्रजापतिः’ हैं । पिछले मन्त्र “ब्रह्म  जज्ञानं  प्रथमं  पुरस्तात् …” और अनन्तर मन्त्र “द्रप्सश्चस्कन्द  पृथिवीमनु…” में भी हम सृष्ट्युत्पत्ति विषय पाते हैं, परन्तु यहां सम्पूर्ण प्रकरण में प्रयोजन है परमात्मा के उस रूप को बताना जिसको मन में धारण करके योगी उपासना करे । सो, यहां ‘हिरण्यगर्भ’ का अर्थ सृष्टि को अपने गर्भ में उत्पन्न करने वाले परमात्मा से है, और ‘प्रजापति’ से उस सृष्टि में जीवों के पालक परमात्मा से ।

यजु० २३।१ – यहां ऋषि ‘प्रजापतिः’ और देवता ‘परमेश्वरः’ हैं । अगले मन्त्र “उपयामगृहीतोऽसि  प्रजापतये…” में जहां परमात्मा को पाने की चर्चा है, वहीं उसके कार्यों की महिमा का वर्णन है । इससे, और महर्षि के वर्णन से, प्रतीत होता है कि यहां बल परमात्मा के सृष्टि रचने आदि कार्यों को समझाने पर है । अर्थ सृष्ट्युत्पत्ति के ही हैं, लेकिन केन्द्रबिन्दु खिसक गया है ! ऋषि परमात्मा के प्रजा उत्पन्न करने के कार्य पर ध्यान आकर्षित कर रहा है और देवता उसके ईशन कार्य व सबका स्वामी होने पर ।

यजु० २५।१० – यहां ऋषि ‘प्रजापतिः’ और देवता ‘हिरण्यगर्भः’ हैं । इस मन्त्र से पिछले कुछ मन्त्र शरीर-रचना के विषय पर हैं । आगे के मन्त्र “यः प्राणतो निमिषतो…” और “यस्येमे हिमवन्तो…” की देवता ‘ईश्वरः’ है । इन दोनों मन्त्रों में महर्षि ने परमात्मा का वर्णन न लेकर, सूर्य में अर्थ घटाया है । सूर्य भी ईश्वर कहलाता है । तीसरे मन्त्र “य आत्मदा बलदा” की देवता ‘परमात्मा’ है, और यहां दोनों परमात्मा और सूर्य अर्थ घटाए गए हैं । वस्तुतः, ‘हिरण्यगर्भ’ सूर्य को भी कहा जाता है क्योंकि उसका गर्भ चमकीला होता है । सूर्य ‘प्रजापति’ = प्रजाओं का पोषक है, इसमें तो कोई सन्देह है ही नहीं । इस अर्थ को लेते हुए, प्रकृत् मन्त्र का अर्थ बनता है – “पृथिवी आदि सौर्य ग्रहों से पहले, सूर्य उत्पन्न होता है । वह सब उत्पन्न प्राणियों का एक असहाय पालक है । वह पृथिवी आदि ग्रहों को अपने आकर्षण से धारण करता है और द्युलोक को स्थापित करता है । उस सुखकारी प्राकृतिक दिव्य-शक्ति सम्पन्न, कमनीय देव को हम हवनों द्वारा परिचरण करें, सेवें ।” इस प्रकार मन्त्र में जीवन को सुखद बनाने के लिए सूर्य के महत्त्व को जानने और शरीर को पुष्ट करने के लिए उसका यज्ञ द्वारा सेवन करने के लिए आह्वाहन किया गया है ।

बहुत सम्भव है कि मेरे बताए उपर्युक्त अर्थों में अनेकों त्रुटियां हों । तथापि मैंने ऊपर यह दर्शाने का प्रयत्न किया है कि एक ही मन्त्र के तीन सर्वथा भिन्न अर्थ पूर्णतया सम्भव हैं; और जहां वे समान भी हैं, उन अर्थों को कहने का अभिप्राय भिन्न है । यह भिन्नता ऋषि और देवता के भेद से इंगित की गई है । इनको देखकर और प्रकरण को समझकर, हम मन्त्र के लक्षित अर्थ तक पहुंच सकते हैं । सर्वत्र एक ही अर्थ मानने से वेद में पुनरुक्ति दोष आएगा और मन्त्र का द्वितीय, तृतीय बार कहना व्यर्थ होने लगेगा ।


[1] प्राणाय नमः… यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥अथर्व० ११।४।१॥ – में भी इसी उद्गार की ध्वनि है ।